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मृतक के बाद पैतृक जमीन की वरासत (दाखिल-खारिज) कैसे कराएं? जानिए धारा 33 के नियम, प्रपत्र आर.सी.-9 व ऑनलाइन ई-वरासत प्रक्रिया

📅 प्रकाशित: 5 अक्टूबर 2026 • 🔄 अंतिम अपडेट: 5 अक्टूबर 2026 • ⏱️ पढ़ने का समय: 6 मिनट

परिवार में पिता, दादा या किसी भूमिधर की मृत्यु के बाद परिजन गहरे शोक में होते हैं। ऐसे समय में अक्सर राजस्व कागजात (खतौनी) में नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया की ओर ध्यान नहीं जाता। कई परिवारों में तो 10 से 15 साल बीत जाने के बाद भी जमीन मृतक पूर्वज के नाम ही दर्ज रहती है।

समय पर वरासत दर्ज न कराना भविष्य में बहुत भारी कानूनी विवादों को जन्म देता है। जब तक सरकारी खतौनी में वैध वारिसानों के नाम नहीं चढ़ते, तब तक न तो बैंक से कोई कृषि ऋण या किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) मिल सकता है, न ही उस जमीन को कानूनी रूप से बेचा या आपस में बांटा जा सकता है। उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 33 के तहत वरासत दर्ज कराने की एक बहुत ही सरल, पारदर्शी और निर्धारित समयसीमा वाली विधिक व्यवस्था है। इस लेख में हम वरासत की संपूर्ण प्रक्रिया को विस्तार से समझेंगे।

तहसीलदार महोदय को वरासत (दाखिल-खारिज) प्रार्थना पत्र तुरंत तैयार करें

तहसील के चक्कर काटने या किसी बिचौलिए को पैसे देने की जरूरत नहीं है। मृतक का विवरण, गाटा संख्या और सभी वैध वारिसानों के नाम दर्ज कर 1 मिनट में विधिक प्रार्थना पत्र तैयार करें:

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1. क्या है उप्र राजस्व संहिता की धारा 33 और प्रपत्र आर.सी.-9?

कानूनी व्यवस्था: उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 33 स्पष्ट प्रावधान करती है कि जब किसी भूमिधर की मृत्यु हो जाती है, तो उसके वैध उत्तराधिकारी (वारिसान) निर्धारित प्रपत्र आर.सी.-9 पर संबंधित राजस्व निरीक्षक (कानूनगो) अथवा तहसीलदार को लिखित/ऑनलाइन सूचना प्रस्तुत करेंगे।

उत्तर प्रदेश सरकार ने इस प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लिए राजस्व परिषद के UP Vaad Portal पर 'ई-वरासत' (ऑनलाइन नामांतरण) की सुविधा प्रारंभ की है, जिसमें आवेदन करते ही वाद संख्या दर्ज हो जाती है।

2. अविवादित वरासत बनाम विवादित वरासत में अंतर

तुलनात्मक बिंदु अविवादित वरासत (प-क 11 / आर.सी.-9) विवादित वरासत (धारा 35 वाद)
स्थिति सभी प्राकृतिक उत्तराधिकारियों के नाम निर्विवाद रूप से दर्ज होने पर। जब किसी पक्ष द्वारा वसीयत, दत्तक ग्रहण (गोदनामा) या हिस्सेदारी को लेकर आपत्ति लगाई जाए।
सक्षम अधिकारी क्षेत्रीय लेखपाल व राजस्व निरीक्षक (कानूनगो)। तहसीलदार / नायब तहसीलदार न्यायालय।
समयसीमा आमतौर पर 30 से 45 दिनों में खतौनी में नाम दर्ज हो जाता है। गवाही, साक्ष्य और अदालती सुनवाई के उपरांत फैसला होता है।
लागत पूरी तरह निःशुल्क सरकारी प्रक्रिया। न्यायालयी प्रक्रिया एवं सामान्य विधिक शुल्क।

3. क्या पैतृक जमीन में विवाहित व अविवाहित बेटियों का भी हक है?

गाँवों में आज भी कई लोग यह भ्रांति फैलाते हैं कि बेटियों की शादी होने के बाद उनका पिता की जमीन में कोई अधिकार नहीं रहता।

वर्तमान विधिक स्थिति: हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम और उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की उत्तराधिकार धाराओं (धारा 108 व धारा 110) के अनुसार, बेटियों का अधिकार बेटों के ठीक बराबर है। चाहे बेटी विवाहित हो, अविवाहित हो या विधवा, पिता की मृत्यु के बाद उसके वैध वारिसानों में पुत्र, विधवा पत्नी और पुत्रियों—सभी का नाम खतौनी में समान रूप से दर्ज होना कानूनी रूप से अनिवार्य है। किसी भी बेटी का नाम छोड़ना गैर-कानूनी है और ऐसी वरासत को बाद में न्यायालय द्वारा निरस्त किया जा सकता है।

4. वरासत दर्ज कराने के लिए आवश्यक दस्तावेजों की चेकलिस्ट

वरासत का ऑनलाइन अथवा ऑफलाइन आवेदन करते समय निम्नलिखित दस्तावेज तैयार रखें:

5. वरासत दर्ज कराने की 4-चरणीय समयबद्ध प्रक्रिया

राजस्व नियमों के अनुसार वरासत की प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में पूरी होती है:

  1. चरण 1 (आवेदन दर्ज करना): आवेदक स्वयं अथवा जन सेवा केंद्र (CSC) के माध्यम से 'ई-वरासत पोर्टल' पर सभी वारिसानों के नाम व गाटा विवरण दर्ज कर आवेदन करता है।
  2. चरण 2 (लेखपाल स्थलीय जांच): आवेदन की डिजिटल कॉपी क्षेत्रीय लेखपाल के लॉगिन में जाती है। लेखपाल को 15 दिन के भीतर गाँव में जाकर परिवार रजिस्टर व स्थानीय पड़ोसियों से वारिसानों की सत्यता की जांच कर अपनी आख्या ऑनलाइन दर्ज करनी होती है।
  3. चरण 3 (राजस्व निरीक्षक का आदेश): लेखपाल की सकारात्मक आख्या मिलने पर राजस्व निरीक्षक (कानूनगो) प-क 11 के अंतर्गत वरासत दर्ज करने का डिजिटल अनुमोदन आदेश पारित करता है।
  4. चरण 4 (खतौनी में नाम दर्ज होना): कानूनगो के आदेश के बाद तहसील के भूलेख कम्प्यूटर कक्ष द्वारा डिजिटल खतौनी में मृतक का नाम हटाकर सभी पुत्रों, पुत्रियों और विधवा के नाम दर्ज कर दिए जाते हैं।
वरासत दाखिल-खारिज प्रार्थना पत्र तुरंत तैयार करें:

हमारा जनरेटर टूल धारा 33 और प्रपत्र आर.सी.-9 के सभी विधिक प्रारूपों के अनुकूल प्रार्थना पत्र तैयार करता है:

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (Frequently Asked Questions)

प्र. 1: भूमिधर की मृत्यु के बाद वरासत दर्ज कराने की समयसीमा क्या है?

उत्तर: उप्र राजस्व संहिता की धारा 33 के अनुसार मृत्यु के 30 से 45 दिनों के भीतर वरासत हेतु आवेदन कर देना चाहिए। अविवादित मामलों में 30 से 45 दिनों में खतौनी में नाम दर्ज हो जाता है।

प्र. 2: क्या विवाहित बेटियों का भी पिता की जमीन में नाम दर्ज होता है?

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। कानून के अनुसार पुत्र और पुत्री (चाहे विवाहित हों या अविवाहित) दोनों का पिता की पैतृक भूमि में बराबर का कानूनी अधिकार है।

प्र. 3: क्या वसीयत (Will) के आधार पर सीधे लेखपाल वरासत दर्ज कर सकता है?

उत्तर: नहीं। वसीयत के आधार पर वरासत का अधिकार लेखपाल को नहीं है। वसीयत के आधार पर नाम दर्ज कराने के लिए धारा 35 के तहत तहसीलदार न्यायालय में वाद दायर कर न्यायिक आदेश लेना अनिवार्य होता है।

प्र. 4: यदि लेखपाल वरासत दर्ज करने में टालमटोल करे तो क्या करें?

उत्तर: सीधे आधिकारिक राजस्व न्यायालय पोर्टल (vaad.up.nic.in) पर ऑनलाइन 'ई-वरासत' आवेदन करें। ऑनलाइन नंबर की उच्चाधिकारियों द्वारा साप्ताहिक समीक्षा होती है, जिससे लेखपाल टालमटोल नहीं कर सकता।

प्र. 5: वरासत दर्ज कराने का सरकारी शुल्क कितना है?

उत्तर: अविवादित प्राकृतिक वरासत (उत्तराधिकार) सरकार द्वारा पूर्णतः निःशुल्क सेवा घोषित की गई है। इसके लिए कोई भी सरकारी कोर्ट फीस देय नहीं होती।

प्र. 6: यदि परिवार का कोई सदस्य बाहर रहता हो, तो क्या उसका नाम छूट जाएगा?

उत्तर: नहीं, परिवार रजिस्टर में दर्ज सभी पुत्रों व पुत्रियों के नाम आवेदन में दर्ज होने चाहिए। बाहर रहने के आधार पर किसी भी कानूनी उत्तराधिकारी का नाम नहीं काटा जा सकता।

प्र. 7: वरासत पूरी होने के बाद नई खतौनी कहाँ से मिलेगी?

उत्तर: आदेश का अमलदरामद होने के बाद आप सीधे उत्तर प्रदेश भूलेख पोर्टल (upbhulekh.gov.in) अथवा नजदीकी सीएससी केंद्र से अपने नाम वाली नई खतौनी डाउनलोड कर सकते हैं।

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विशाल राज (Vishal Raj)
संस्थापक, Application Helper

विशाल राज नागरिक अधिकारों, भूमि राजस्व संहिता और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के विश्लेषक हैं। उनका उद्देश्य नागरिकों को कानूनी अधिकारों की सही जानकारी देकर अनावश्यक भागदौड़ से बचाना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है।